मंदिर का परिचय
उज्जैन के पश्चिमी भाग में क्षिप्रा नदी के समीप जयसिंहपुरा का दिगम्बर जैन मंदिर जैन तीर्थ निर्देशिकाओं में श्री नेमिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र एवं पुण्य भूमि के नाम से दर्ज है। इसके पास ही दिगम्बर जैन संग्रहालय है, जिसकी स्थापना सन् 1944 में श्री दिगम्बर जैन मालवा प्रांतिक सभा, बड़नगर ने की थी और जिसमें मालवा अंचल से एकत्र लगभग 560 जैन प्रतिमाएँ और शिल्पखंड सुरक्षित हैं। जिनालय और संग्रहालय मिलकर जयसिंहपुरा को उज्जैन की प्राचीन जैन विरासत से परिचय का प्रमुख स्थान बनाते हैं।
जयसिंहपुरा का जिनालय
जयसिंहपुरा उज्जैन के पश्चिमी भाग का एक पुराना मोहल्ला है, जो महाकालेश्वर क्षेत्र और क्षिप्रा नदी के बीच बसा है। यहाँ का दिगम्बर जैन मंदिर मध्य प्रदेश के दिगम्बर जैन तीर्थों की प्रचलित सूचियों में श्री नेमिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र एवं पुण्य भूमि, जयसिंहपुरा के नाम से दर्ज है। नाम से ही स्पष्ट है कि मुख्य वेदी के मूलनायक बाईसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ हैं। उज्जैन के दिगम्बर जैन मंदिरों की स्थानीय सूचियों में भी इसे श्री नेमिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, जयसिंहपुरा लिखा गया है। उपलब्ध स्रोतों में मंदिर के निर्माण या प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती और न ही मूलनायक प्रतिमा का विस्तृत वर्णन, इसलिए यह वेबसाइट ऐसा कोई दावा नहीं करती। इतना निश्चित है कि यह मंदिर लंबे समय से उज्जैन के दिगम्बर जैन समाज का केंद्र रहा है और सन् 1944 से समाज का पुरातात्विक संग्रह भी यहीं है।
अतिशय क्षेत्र एवं पुण्य भूमि
दिगम्बर परंपरा में अतिशय क्षेत्र वह तीर्थ है जिसे श्रद्धालु किसी विशेष, अतिशयपूर्ण घटना से जुड़ा मानकर पूजते हैं। यह सिद्ध क्षेत्र से भिन्न है, जहाँ किसी आत्मा ने मोक्ष पाया हो, और कल्याणक क्षेत्र से भी, जो तीर्थंकर के जीवन की घटनाओं से जुड़ा होता है। दिगम्बर तीर्थ सूचियों में जयसिंहपुरा अतिशय क्षेत्र की श्रेणी में है और जैन स्मृति में उज्जैन के स्थान के कारण इसे पुण्य भूमि भी कहा जाता है। तीर्थ निर्देशिकाएँ यह भी बताती हैं कि कुछ लोग उज्जैन को सिद्ध क्षेत्र मानते हैं, क्योंकि परंपरा के अनुसार मुनि अभयघोष ने यहीं से मोक्ष प्राप्त किया। जयसिंहपुरा की प्रतिमा से जुड़ी अतिशय की विशेष कथाएँ हमें उपलब्ध स्रोतों में लिखित नहीं मिलीं, इसलिए अपुष्ट बातें यहाँ नहीं दोहराई गई हैं। जो श्रद्धालु इन्हें जानना चाहें, वे मंदिर के पुजारी या समिति के सदस्यों से पूछ सकते हैं।

दिगम्बर जैन संग्रहालय: 1944 से आज तक
संग्रहालय की स्थापना सन् 1944 में श्री दिगम्बर जैन मालवा प्रांतिक सभा, बड़नगर ने की, ताकि मालवा में इधर-उधर बिखरी जैन प्रतिमाओं और मंदिरों के अवशेषों को बचाया जा सके। शासन की अनुमति लेकर सभा ने संग्रह का कार्य आरंभ किया और धीरे-धीरे लगभग 560 पुरावशेष जयसिंहपुरा लाए गए। संग्रहालय के अपने विवरण के अनुसार इसकी स्थापना और प्रतिमाओं के संग्रह में श्री सत्यंधर कुमार सेठी का प्रमुख योगदान रहा। कई दशकों तक ये कलाकृतियाँ एक जीर्ण भवन में बिना व्यवस्थित प्रदर्शन और सुरक्षा के रखी रहीं। सन् 2009-10 में इंदौर के श्री प्रदीप कुमार कासलीवाल ने सभा के अध्यक्ष बनने पर आधुनिक संग्रहालय की योजना बनाई। भारत सरकार की क्षेत्रीय एवं स्थानीय संग्रहालय योजना के अनुदान और सभा के अपने साधनों से नया भवन बना और अप्रैल 2015 में नए रूप में प्रदर्शन आरंभ हुआ। सभी पुरावशेषों का अभिलेखन और पंजीयन किया गया तथा सूची-ग्रंथ भी तैयार हुआ।
दीर्घाएँ और दर्शनीय सामग्री
संग्रहालय चार मुख्य दीर्घाओं में सजा है। चौबीस तीर्थंकर दीर्घा में वर्तमान अवसर्पिणी के चौबीसों तीर्थंकरों, भगवान आदिनाथ से भगवान महावीर तक, की प्रतिमाएँ हैं और यह समझाया गया है कि पादपीठ पर अंकित चिह्न से प्रत्येक तीर्थंकर की पहचान कैसे होती है। आदिनाथ और पार्श्वनाथ के लिए अलग-अलग दीर्घाएँ हैं, जबकि मूर्तिकला दीर्घा में जैन शिल्प की व्यापक झलक मिलती है, जिसमें यक्ष-यक्षी की प्रतिमाएँ और मुनियों के चरण-चिह्न भी हैं। छोटी वस्तुएँ अनेक शोकेसों में प्रदर्शित हैं। संग्रहालय के अनुसार ये कलाकृतियाँ गुप्तोत्तर काल में प्रतिहार, परमार और कच्छपघात शासकों के समय मालवा में बने मंदिरों की हैं। यहाँ ध्वनि-व्यवस्था से युक्त एक सभागार भी है, जहाँ वृत्तचित्र और तीर्थंकर की माता के सोलह शुभ स्वप्नों पर आधारित 3डी फिल्म दिखाई जाती है। दीर्घाओं के भीतर फोटोग्राफी वर्जित बताई गई है।

जैन इतिहास में उज्जयिनी
उज्जैन, अर्थात् प्राचीन उज्जयिनी और अवंति की राजधानी, जैन स्मृति में आदरणीय स्थान रखती है। दिगम्बर परंपरा के अनुसार अंतिम श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु ने बारह वर्ष के दुर्भिक्ष का पूर्वानुमान कर विशाल संघ के साथ दक्षिण की ओर विहार किया; कहा जाता है कि मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त ने मुनि दीक्षा लेकर उनका साथ दिया। यह संबंध श्रवणबेलगोला के लगभग छठी-सातवीं शताब्दी और उसके बाद के शिलालेखों में मिलता है। तीर्थ निर्देशिकाएँ आचार्य का यह प्रस्थान उज्जैन से बताती हैं। परिशिष्टपर्व जैसे जैन ग्रंथ अशोक के पौत्र सम्प्रति को जैन धर्म के निष्ठावान संरक्षक के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने उज्जैन से शासन किया। श्वेताम्बर परंपरा आचार्य सिद्धसेन दिवाकर और कल्याण मंदिर स्तोत्र को अवंति पार्श्वनाथ की प्रतिमा से जोड़ती है और कालकाचार्य कथा की घटनाएँ भी इसी नगर की हैं। परंपरा यह भी मानती है कि भगवान महावीर ने यहाँ के श्मशान में उपसर्ग सहन किया। 2011 की जनगणना में नगर की लगभग 2.4 प्रतिशत जनसंख्या जैन थी।
यात्रियों के लिए सुविधाएँ
जैन तीर्थ निर्देशिकाओं के अनुसार क्षेत्र पर ठहरने की व्यवस्था है; उनमें कमरे, हॉल और भोजनशाला दर्ज हैं। मंदिर से जुड़ी धर्मशाला, श्री नेमिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र भवन, एक यात्री-बुकिंग पोर्टल पर सूचीबद्ध है, जहाँ दो बिस्तरों वाले साधारण नॉन-एसी कमरे, संलग्न शौचालय, गर्म पानी, पेयजल, पार्किंग और सीसीटीवी की सुविधा बताई गई है; उसी सूची के अनुसार मुख्य द्वार रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक बंद रहता है। उस सूची में भोजनशाला का उल्लेख नहीं है, इसलिए जिन यात्रियों को जैन भोजन चाहिए वे यात्रा से पहले प्रबंधन से वर्तमान व्यवस्था की पुष्टि कर लें। पता जयसिंहपुरा रेलवे क्रॉसिंग के पास का है, जो महाकालेश्वर मंदिर से लगभग 1.6 किमी दूर है। कमरों का किराया बदलता रहता है, इसलिए यहाँ नहीं दिया गया है। मंदिर की कोई आधिकारिक वेबसाइट या प्रमाणित फोन नंबर पुष्ट नहीं हो सका, अतः ठहरने की व्यवस्था मंदिर कार्यालय में स्वयं जाकर या उज्जैन के दिगम्बर जैन समाज के माध्यम से करना उचित होगा।

एक नज़र में
- परंपरा
- दिगम्बर जैन
- मूलनायक
- भगवान नेमिनाथ, बाईसवें तीर्थंकर (जैन तीर्थ निर्देशिकाओं के अनुसार)
- तीर्थ का प्रकार
- अतिशय क्षेत्र एवं पुण्य भूमि
- स्थान
- जयसिंहपुरा, पश्चिमी उज्जैन, क्षिप्रा तट के समीप
- संग्रहालय की स्थापना
- सन् 1944, श्री दिगम्बर जैन मालवा प्रांतिक सभा, बड़नगर द्वारा
- संग्रहालय का संग्रह
- मालवा व आसपास के क्षेत्रों की लगभग 560 जैन प्रतिमाएँ और पुरावशेष
- नया संग्रहालय भवन
- पुनर्निर्माण के बाद अप्रैल 2015 में पुनः आरंभ
- संग्रहालय का समय
- प्रातः 8 बजे से सायं 7 बजे तक, सभी दिन (संग्रहालय की अपनी वेबसाइट के अनुसार)